Jantar Mantar अब दिल्ली के निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची में नहीं है। दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में यह बदलाव किया और प्रदर्शनों के लिए तीन नई जगहें तय कीं: रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और शाहदरा का CBD ग्राउंड। करीब तीन दशक से जो सड़क देशभर के आंदोलनकारियों की पहली पसंद रही, उसके लिए यह एक बड़ा मोड़ है।
इस फैसले को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि एक खगोलीय वेधशाला के बाहर की सड़क देश की सबसे चर्चित प्रदर्शन-जगह कैसे बनी, अदालतों ने इस पर क्या कहा, और नया आदेश असल में क्या बदलता है।
वेधशाला से धरना स्थल तक का सफर
जंतर-मंतर को जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में बनवाया था। उद्देश्य था खगोलीय गणना: समय मापना, ग्रहों की स्थिति जानना और पंचांग को सटीक बनाना। ईंट और चूने से बने इसके विशाल यंत्र, जिनमें सम्राट यंत्र सबसे प्रसिद्ध है, आज भी अपनी जगह खड़े हैं। तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि ढाई सौ साल से भी ज़्यादा समय बाद इसकी पहचान विज्ञान से ज़्यादा विरोध की आवाज़ से जुड़ जाएगी।
यह बदलाव 1988 के बाद शुरू हुआ। उस साल अक्टूबर में भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हज़ारों किसान इंडिया गेट के पास बोट क्लब पर जुटे और कई दिनों तक वहीं डटे रहे। इस आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शनों को लेकर सख्ती बढ़ गई। प्रदर्शनकारियों को ऐसी जगह चाहिए थी जो संसद के पास हो, और 1990 के दशक में संसद मार्ग से सटी जंतर-मंतर रोड धीरे-धीरे वही जगह बन गई।
जिन आंदोलनों ने Jantar Mantar को पहचान दी
अगले तीन दशकों में यहां कई ऐसे आंदोलन हुए, जिनकी चर्चा पूरे देश में हुई। अप्रैल 2011 में अन्ना हज़ारे ने जन लोकपाल की मांग को लेकर यहीं से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की शुरुआत की। 2015 में पूर्व सैनिकों ने वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर यहां लंबा धरना दिया। 2017 में तमिलनाडु के किसान सूखा राहत और कर्ज़ माफी की मांग लेकर आए और कई हफ्तों तक बैठे रहे। 2023 में देश के कई नामी पहलवानों का धरना भी यहीं हुआ, जिस पर देशभर की नज़र रही।
इन चर्चित आंदोलनों के बीच हर दिन छोटे-छोटे समूह भी यहां पहुंचते रहे। किसी को ज़मीन के मुआवज़े का सवाल उठाना था, किसी को भर्ती परीक्षा का, तो किसी को अपने ज़िले की किसी पुरानी समस्या का। इनमें से बहुतों की बात कभी सुर्खियों तक नहीं पहुंची, लेकिन उनके लिए जंतर-मंतर वह जगह थी जहां से आवाज़ सीधे संसद के दरवाज़े तक जाती थी।
शोर और गंदगी की शिकायतों के बाद अदालत पहुंचा मामला
हर सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है। Jantar Mantar के आसपास रहने वाले लोगों और कारोबारियों ने लंबे धरनों, लाउडस्पीकर के शोर, जाम और कचरे की शिकायतें कीं। मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) पहुंचा। 5 अक्टूबर 2017 को NGT ने जंतर-मंतर रोड पर धरने-प्रदर्शन और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाने का निर्देश दिया और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने की बात कही।
इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 23 जुलाई 2018 को मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंतर-मंतर जैसी जगह पर प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लोकतंत्र का अहम हिस्सा माना, लेकिन यह भी साफ किया कि आसपास रहने वालों के शांति से जीने के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था का भी ध्यान रखना होगा। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से दोनों के बीच संतुलन बनाने वाले दिशा-निर्देश तैयार करने को कहा।
इसके बाद जो व्यवस्था बनी, उसमें जंतर-मंतर पर तय सीमा तक, अधिकतम 5,000 लोगों के प्रदर्शन की अनुमति थी, जबकि इससे बड़े आयोजनों के लिए रामलीला मैदान का विकल्प रखा गया। पिछले आठ साल तक यही ढांचा चलता रहा।
Jantar Mantar की जगह अब इन तीन जगहों पर होंगे प्रदर्शन
नए आदेश के बाद दिल्ली में प्रदर्शन के लिए तीन जगहें निर्धारित की गई हैं:
- रामलीला मैदान, मध्य दिल्ली — जंतर-मंतर से करीब 3 किलोमीटर
- CBD ग्राउंड, शाहदरा, पूर्वी दिल्ली — करीब 12 किलोमीटर
- बुराड़ी ग्राउंड, उत्तरी दिल्ली — करीब 23 किलोमीटर
दिल्ली पुलिस के मुताबिक यह फैसला केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से गठित एक समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। हालांकि, इन जगहों पर प्रदर्शन की अनुमति कैसे मिलेगी, कितने लोग जुट सकेंगे और आयोजन से जुड़ी बाकी शर्तें क्या होंगी, इसके लिए संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अभी जारी होना बाकी है। SOP आने के बाद ही नई व्यवस्था की पूरी तस्वीर साफ होगी।
वीडियो: जंतर-मंतर पर News ढाणी की रिपोर्ट
फैसले पर प्रतिक्रियाएं
आदेश सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने इसकी आलोचना की। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और भाकपा (माले) लिबरेशन के नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक विरोध की जगह को सीमित करने वाला कदम बताया। वहीं नई दिल्ली ट्रेडर्स एसोसिएशन ने फैसले का स्वागत किया और कहा कि इससे इलाके में रोज़ के जाम और भीड़ से राहत मिलेगी।
प्रदर्शन का अधिकार बरकरार, बदली है जगह
यह समझना ज़रूरी है कि जंतर-मंतर को सूची से हटाने का मतलब विरोध के अधिकार का खत्म होना नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी और बिना हथियार शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार देता है। साथ ही यह सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था के हित में उचित पाबंदियां लगाने की छूट भी देता है। नया आदेश इसी दायरे में जगह तय करने का फैसला है।
असली सवाल व्यावहारिक है। दशकों तक जंतर-मंतर किसानों, पूर्व सैनिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और दूर-दराज़ के ज़िलों से आने वाले छोटे समूहों के लिए सबसे सुलभ जगह रहा। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और संसद, दोनों इसके पास हैं। बुराड़ी या शाहदरा तक पहुंचना ऐसे समूहों के लिए समय और खर्च, दोनों के लिहाज़ से मुश्किल हो सकता है। इसलिए नई व्यवस्था की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि SOP में अनुमति की प्रक्रिया कितनी सरल और पारदर्शी रखी जाती है।
अगर कोई संगठन या समूह आने वाले दिनों में दिल्ली में प्रदर्शन की योजना बना रहा है, तो उसे दिल्ली पुलिस से लिखित अनुमति लेनी होगी और SOP जारी होने तक आधिकारिक निर्देशों पर नज़र रखनी होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
क्या अब Jantar Mantar पर प्रदर्शन हो सकता है?
नहीं। दिल्ली पुलिस के 11 अक्टूबर 2026 के आदेश के बाद जंतर-मंतर निर्धारित प्रदर्शन स्थल नहीं है। अब प्रदर्शन रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड या शाहदरा के CBD ग्राउंड में होंगे।
Jantar Mantar विरोध-प्रदर्शनों का केंद्र कैसे बना?
1988 में बोट क्लब पर महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन के बाद वहां प्रदर्शनों पर सख्ती बढ़ी। इसके बाद 1990 के दशक में संसद के पास होने के कारण जंतर-मंतर रोड प्रमुख धरना स्थल बन गई।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में जंतर-मंतर पर क्या फैसला दिया था?
23 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती, और पुलिस से प्रदर्शन के अधिकार व स्थानीय लोगों की सुविधा के बीच संतुलन वाले दिशा-निर्देश बनाने को कहा।
नए प्रदर्शन स्थलों के नियम कब आएंगे?
दिल्ली पुलिस की संशोधित SOP अभी जारी होनी है। उसी में अनुमति की प्रक्रिया और बाकी शर्तें तय होंगी।
निष्कर्ष
Jantar Mantar का इतिहास बताता है कि लोकतंत्र में विरोध की जगह सिर्फ एक भौगोलिक पता नहीं होती, वह लोगों के भरोसे से बनती है कि उनकी बात सुनी जाएगी। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और शहर की सामान्य व्यवस्था, दोनों ज़रूरी हैं। नए आदेश के बाद असली परीक्षा इसी संतुलन की होगी: नई जगहें कितनी सुलभ रहती हैं और प्रदर्शनकारियों को अपनी बात रखने का मौका कितनी आसानी से मिलता है।
स्रोत: दिल्ली पुलिस का आदेश (11 अक्टूबर 2026) · सुप्रीम कोर्ट का फैसला, मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (23 जुलाई 2018) · नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का आदेश (5 अक्टूबर 2017) · भारत का संविधान, अनुच्छेद 19 · राजनीतिक दलों और नई दिल्ली ट्रेडर्स एसोसिएशन के सार्वजनिक बयान
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