जब राजस्थान की बात होती है, तो अक्सर सभी राजस्थान के ऐतिहासिक किलों और महलों की प्रसंशा करते हैं लेकिन वहीँ अगर आस्था और श्रद्धा की बात की जाये तो राजस्थान के ये 5 प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर सभी को इनसे जुडी अनोखी मान्यताओं, रोचक इतिहास और अद्भुत स्थापत्य कला से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
क्या है खासियत इन राजस्थान के 5 प्राचीन शिव मंदिरों की?
सावन के पावन महीने में इन प्राचीन मंदिरों पर विशेष रौनक देखने को मिलती है… जब हर भोलेनाथ के मंदिरों में मनोहारी श्रृंगार, गूंजते शिव जयकारे, घंटियों की मधुर ध्वनि और श्रद्धालुओं का उमड़ता जनसैलाब… दिव्य वातावरण हर भक्त के मन को भक्ति से सराबोर कर देता है….सावन के पूरे महीने सुबह ब्रह्ममुहूर्त से लेकर देर शाम तक शिवालयों में दर्शन और जलाभिषेक के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। कोई कांवड़ लेकर पहुंचता है, तो कोई बेलपत्र, धतूरा और गंगाजल अर्पित कर भोले बाबा का आशीर्वाद प्राप्त करता है। ऐसे में राजस्थान की पावन धरा पर भी अनेक प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर विराजमान हैं जिनकी अपनी अलग महिमा, मान्यता और गौरवशाली इतिहास है, जो हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। तो सावन के पर्व पर आइए जानते हैं राजस्थान के 5 प्रसिद्ध शिवालयों के बारे में, जिनका धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व भी खास है।
1. तारकेश्वर महादेव मंदिर (जयपुर, राजस्थान ):
आपने बहुत से मंदिर देखे होंगे जिन्हें बनाने के लिए पेड़ काटे गए हैं, लेकिन क्या आपने ऐसे मंदिर के बारे में पढ़ा है जिसे बनाने के लिए कोई भी पेड़ नहीं काटा गया हो। दरअसल जयपुर के बीच बाजार में स्थित तारकेश्वर महादेव मंदिर, वो प्राचीन मंदिर है जो जयपुर की स्थापना से भी पहले का माना जाता है। इस मंदिर के नाम के पीछे की कहानी भी खास है, ऐसा माना जाता है कि जब जयपुर शहर की स्थापना नहीं हुई थी उससे पहले यहां बड़ी संख्या में तार के पेड़ हुआ करते थे, इसलिए इसका नाम तारकेश्वर महादेव पड़ गया। आपको बता दे की मंदिर का वर्तमान स्वरूप वास्तुविद विद्याधर ने दिया है, वहीं किवदंती के अनुसार इस शिवलिंग को किसी ने स्थापित नहीं किया यह खुद प्रकट हुई शिवलिंग है इसलिए इसे स्वयंभू शिवलिंग माना जाता है. इस मन्दिर मे जयपुर वासियों की काफी आस्था हैं और इसलिए यहां शिवरात्रि या सावन के महीनें में लोगों का ताता लगा रहेता है।
2. झारखंड महादेव मंदिर (जयपुर, राजस्थान ):
अगर आप उत्तर भारत में रह कर दक्षिण का अहसास लेना चाहते हैं, तो जयपुर के वैशाली नगर में स्थित झारखंड महादेव जरूर जाएं। यह जयपुर का 100 वर्ष पुराना दक्षिण शाली में बना एकमात्र मंदिर है। तारकेश्वर मंदिर की तरह यह भी स्वयंभू शिवलिंग है। लोगों के अनुसार यहां पहले घने जंगल और झाड़ियां हुआ करती थी, तभी यहां पर शिवलिंग प्रकट हुई तब से इसका नाम झारखंड महादेव मंदिर पढ़ा गया है। यह जयपुर का एकमात्र मंदिर है जो दक्षिण मंदिर शाली में तिरुचिरापल्ली की तर्ज पर बना है। इसकी बाहरी संरचना दक्षिण शाली जैसी है, वही दूसरी ओर अंदरूनी बनावट उतर शाली में बनी हुई है। इस मंदिर की खासियत है कि, जो भी भक्त पंचामृत से यहां शिवलिंग का जलाभिषेक करता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है इसलिए हर सावन इस मंदिर में हजारों की संख्या में श्रद्धालू कावर लेकर देखने को मिलते हैं।
3. अंबिकेश्वर महादेव मंदिर (जयपुर, राजस्थान ):
छोटी काशी कहा जाने वाला जयपुर में एक ऐसा प्राचीन महादेव का मंदिर है, जिसे लोग दूर-दूर से देखने आते है,वो है आमेर के पास स्थित अमिबकेश्वर महादेव मंदिर या फिर उण्डा महादेव मंदिर है। इस मंदिर का इतिहास करीब 5000 साल पुराना बताया जाता है लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर 10वीं शताब्दी का बना हुआ है। यहां के पंडित के अनुसर यह भी माना जाता है कि 5000 साल पहले यहां भोलेनाथ की पूजा अर्चना के लिए श्रीकृष्ण खुद यहां पर आए थे। इस मंदिर की एक और खासियत है कि यह भूतल से नीचे स्थापित है। वहीं इस मंदिर से जुड़ी एक और कहानी लोगों के बीच प्रचलित है, ऐसा माना जाता है कि एक दिन कछवाहा राजपूत राजा काकिल देव के मुखबिर ने ऐसी विचित्र घटना बताई जिसे राजा सुन कर हैरान हो गए। मुखबीर ने ऐसी गाय के बारे में बताया जो सिर्फ एक ही जगह पर दूध दिया करती थी। जब राजा ने उस जगह की खुदाई कराई तो वहां से एक शिवलिंग मिला। जिसके बाद राजा ने वहां एक मंदिर का निर्माण कराया, जिसे आज अंबिकेश्वर महादेव मंदिर से जाना जाता है। इतना ही नहीं, यह पूरा मंदिर केवल 14 खंभों पर टिका हुआ है, जो उस समय की इतनी विकसित स्थापत्य कला का अद्वितीय उदाहरण है। इसलिए आज भी यह मंदिर हमें अपने मूल रूप में देखने को मिलता है। वहीं सावन के महीने में श्रद्धालू यहां जल, दूध, बेलपत्र अर्पित कर भोलेनाथ से अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं और शंभू का आर्शीवाद लेने पहुंचते है।
4. एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर (जयपुर, राजस्थान ):
अगर आप जयपुर वासी हैं या नहीं भी हो लेकिन आपने प्रसिद्ध जयपुर के साल में एक बार खुलने वाले महादेव मंदिर के बारे में सुना ही होगा। जी हां हम बात कर रहे हैं जयपुर के प्रसिद्ध मोती डोंगरी स्थित एकलिंगेश्वर महादेव मंदिर की, जो सिर्फ साल में एक बार ही खुला करता था, लेकिन कोविड के बाद से इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया है। मान्यताओ के अनुसार यह मंदिर जयपुर की स्थापना से भी पहले का माना जाता है। वही इस मंदिर की एक रहस्यमई बात यह भी है कि जब भी इस मंदिर में शिव परिवार को स्थापित किया जाता है तब-तब शिवलिंग को चोड़क सारी मूर्ति गायब हो जाती है। इसी के साथ यहां मंदिर की पूजा अर्चना की जिम्मेदारी जयपुर के राज परिवार को दी गई है, लेकिन भक्तों के लिए यह साल में सिर्फ एक बार शिवरात्रि का दिन ही खुलता है। सावन के महीने में यहां कई लीटर जल का सहस्त्र घट जलाभिषेक होता है लेकिन कुछ सुरक्षा कारणों के वजह से यह मंदिर अभी श्रद्धालुओ की राह देख रहा है।
5. नीलकंठ महादेव मंदिर (अलवर, राजस्थान ):
सरिस्का टाइगर रिजर्व के घने जंगलो में स्थित भगवान शिव का ऐसा मंदिर है, जो अपनी राजस्थानी स्थापना कला, शांत वातावरण और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, वो है नीलकंठ महादेव मंदिर। टाइगर रिज़र्व में मौजुद शिलालेख से ये पता चलता है कि ये मंदिर 961 इसवी के बने हुए हैं जिसे प्रतिहारा सम्राट महाराजाधिराज मथनदेव बड़गुजर ने करवाया था। यह मंदिर मध्यकालीन में 200 मंदिरों से मिल कर बना है, जिसे औरंगजेब के द्वारा नष्ट करवा दिया गया था। स्थानी लोगो के अनुसर ऐसा मना जाता है कि आक्रमण के समय इस मंदिर की रक्षा मुधुमाखियों ने की थी जिस के कारण यह मंदिर आज भी अपने मूल संरचना में सुरक्षित है। अगर हम इसके वास्तुकला की बात करें तो यह मंदिर त्रिकुटा शाली में बना हुआ है यानी इसके 3 गर्भगृह हैं, जिनमें से एक गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। यहां के स्तंभ और दिवारों पर सुंदर बारिक नक्काशी की गई है जो मंदिर की भव्यता को और बढ़ा देती है। वहीं मूर्तिकला का कुछ भाग प्रसिद्ध खजुराहो मंदिरों में पाई जाने वाली कामुक आकृतियों से मिलता जुलता है। यहां सावन के महीने में तो लोग दूर-दूर से भगवान नीलकंठ महादेव के दर्शन करने आते हैं और मंदिर की सुंदरता और भक्तिमय वातावर्ण का आनंद लेते है।
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